छेरछेरा, छत्तीसगढ़ का प्रमुख लोकपर्व है, जिसे पौष पुन्नी भी कहा जाता है। यह पर्व पौष माह की पूर्णिमा को नई फसल के आगमन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन बच्चे घर-घर जाकर “छेरछेरा” माँगते हैं और लोग धान, कोदो व अन्य अन्न दान करते हैं। यह पर्व अन्न, दान और सामुदायिक साझेदारी की जीवंत परंपरा को दर्शाता है।
छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ में पौष माह की पूर्णिमा (जनवरी) को मनाया जाता है, जो नई फसल की कटाई और घर आने की खुशी में मनाया जाने वाला एक कृषि आधारित उत्सव है, जिसमें लोग घर-घर जाकर धान और अनाज मांगते हैं, दान करते हैं और सामाजिक समरसता व अहंकार-मुक्ति का संदेश देते हैं, और इसे शाकंभरी जयंती और भगवान शंकर द्वारा माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगने की पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है.
कब मनाया जाता है?
हर साल पौष मास की पूर्णिमा (Poush Purnima) के दिन, जो आमतौर पर जनवरी महीने में आती है.
क्यों मनाया जाता है?
1.फसल उत्सव (Harvest Festival): यह नई फसल (धान) की कटाई और उसे घर में सुरक्षित लाने के बाद किसानों की खुशी और मेहनत का उत्सव है, जिससे वे समाज के साथ खुशियाँ बांटते हैं.
2.दान और उदारता (Donation & Generosity): इस दिन बच्चे, युवा और बड़े समूह बनाकर घर-घर जाते हैं और 'छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरहरा' (हे माँ, कोठी के धान ला दो) बोलते हुए अनाज, साग-भाजी और पैसे मांगते हैं, जो उदारता और जरूरतमंदों को देने की भावना को दर्शाता है.
3.पौराणिक मान्यता: एक कथा के अनुसार, इस दिन भगवान शंकर ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी, इसलिए इस दिन दान का विशेष महत्व है.
4.अहंकार-मुक्ति: यह पर्व अहंकार को समाप्त करने और सभी को एकजुट करने का प्रतीक है.
शाकंभरी जयंती: कई जगहों पर यह शाकंभरी देवी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्होंने अकाल के समय अन्न, फल और औषधि प्रदान किए थे.
लोग पारंपरिक वाद्ययंत्रों (डंडा, मांदर, ढोलक) के साथ टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं.
'छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहरा' के गीत गाते हैं और दान (धान, रुपये, मिठाई) लेते हैं.
इस दिन घर में नए चावल से बने पकवान (जैसे आइरसा, सोहारी) बनते हैं और सामूहिक भोज होता है.
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